Saturday, July 24, 2010

बोलो बोलो कुछ तो बोलो

कमल पुष्प सी ऑंखें खोलो,
बोलो बोलो कुछ तो बोलो,

इस निद्रा से ऑंखें खोलो,
बोलो बोलो कुछ तो बोलो,

असमय तुमको नींद क्यूँ आई,
भोर भई अब जागो भाई,

देखो सब आये हैं मिलने,
दूर-दूर से बातें करने,

परिजन पुरजन सब आये हैं,
एक मिलन की आस लाये हैं,

ये तुमने क्यों मौन है साधा,
बोलो क्या मन में है बाधा,

क्यूँ नहीं झट से तुम हो उठते,
क्यूँ नहीं सबसे बातें करते,

केवल तुम ही चुप लेटे हो,
क्यूँ हमको ये दुःख देते हो,

यूँ सबका अपमान करो मत,
जागो अब तो देर करो मत,

जल्दी ये शीतलता त्यागो,
उठ बैठो और दौड़ो भागो,

दूर गगन से उड़ कर आये,
साथ में लेकिन निद्रा लाये,

सबके मन में तुम ही तुम हो,
लेकिन तुम अपने में गुम हो,

अपने उर से बाहर आओ,
सबके मुख पर खुशियाँ लाओ,

तुम तो खुशियों के दाता थे,
सबके मन के प्रिय भ्राता थे,

फिर क्यों आज उलट करते हो,
सबके दिलों में दुःख भरते हो,

सुन भी लो अब निद्रा तोड़ो,
बोलो बोलो कुछ तो बोलो.

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