राम-लखन हमें कहते थे सब भई,
राम-लखन हमें कहते थे सब भई,
अब ये जोड़ी टूट गयी....
सबकी बानी झूठ भई....
खुशियाँ जो अब तक संग फिरती थीं,
सबकी झोलियाँ संग भरती थीं,
सारी खुशियाँ रूठ गयीं...
घर का प्रकाश अब बना अँधियारा,
कौन करे अब इस घर उजियारा,
सारी ज्योति छूट गयी....
पीछे जो छूट गया है वैभव,
और बची ये जो सब दौलत,
विष का कड़वा घूँट भई....
बड़भागी समझ बैठे थे खुद को,
हम सिहा रहे थे इस किस्मत को,
सबकी किस्मत फूट गयी...
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