Sunday, July 25, 2010

वो क्यूँ गया है ये भी बता कर नहीं गया...


रुख्सत हुआ तो नज़रें मिलाकर नहीं गया, वो क्यों गया है ये भी बताकर नहीं गया.

वो यूँ गया कि वाद-ए-सबा याद आ गयी, अहसास तक भी हमको दिलाकर नहीं गया.

यूँ लग रहा है जैसे अभी लौट आयेगा, जाते हुए चिराग बुझाकर नहीं गया.

बस एक लकीर खींच गया दरमियाँ में, दीवार रास्ते में लगाकर नहीं गया.

शायद वो मिल ही जाए मगर जुस्तजू है शर्त, वो अपने नक़्शे-ए-पा मिटाकर नहीं गया.

घर में है आज तक वो ही खुशबू बसी हुयी, लगता है यूँ के जैसे वो आकर कहीं गया.

तब तक तो फूल जैसी ही ताज़ा थी उसकी याद, जब तक वो पत्तियों को जुदा कर नहीं गया.

रहने दिया न उसने किसी काम का मुझे, और खाक में भी मुझको मिलाकर नहीं गया.

वैसी ही बेताब है अभी मेरी जिंदगी, वो खार-ओ-खास में आग लगा कर नहीं गया.

सबसे मिलके पूछता था उनका दर्द-ए-दिल, वो अपने दिल का दर्द जता कर नहीं गया.

'शहजाद' ये गिला ही रहा उसकी याद से, जाते हुए वो कोई गिला कर नहीं गया.

(शहजाद अहमद शहजाद)

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