Sunday, July 25, 2010

वो क्यूँ गया है ये भी बता कर नहीं गया...


रुख्सत हुआ तो नज़रें मिलाकर नहीं गया, वो क्यों गया है ये भी बताकर नहीं गया.

वो यूँ गया कि वाद-ए-सबा याद आ गयी, अहसास तक भी हमको दिलाकर नहीं गया.

यूँ लग रहा है जैसे अभी लौट आयेगा, जाते हुए चिराग बुझाकर नहीं गया.

बस एक लकीर खींच गया दरमियाँ में, दीवार रास्ते में लगाकर नहीं गया.

शायद वो मिल ही जाए मगर जुस्तजू है शर्त, वो अपने नक़्शे-ए-पा मिटाकर नहीं गया.

घर में है आज तक वो ही खुशबू बसी हुयी, लगता है यूँ के जैसे वो आकर कहीं गया.

तब तक तो फूल जैसी ही ताज़ा थी उसकी याद, जब तक वो पत्तियों को जुदा कर नहीं गया.

रहने दिया न उसने किसी काम का मुझे, और खाक में भी मुझको मिलाकर नहीं गया.

वैसी ही बेताब है अभी मेरी जिंदगी, वो खार-ओ-खास में आग लगा कर नहीं गया.

सबसे मिलके पूछता था उनका दर्द-ए-दिल, वो अपने दिल का दर्द जता कर नहीं गया.

'शहजाद' ये गिला ही रहा उसकी याद से, जाते हुए वो कोई गिला कर नहीं गया.

(शहजाद अहमद शहजाद)

Saturday, July 24, 2010

रूठ के हमसे...

बोलो बोलो कुछ तो बोलो

कमल पुष्प सी ऑंखें खोलो,
बोलो बोलो कुछ तो बोलो,

इस निद्रा से ऑंखें खोलो,
बोलो बोलो कुछ तो बोलो,

असमय तुमको नींद क्यूँ आई,
भोर भई अब जागो भाई,

देखो सब आये हैं मिलने,
दूर-दूर से बातें करने,

परिजन पुरजन सब आये हैं,
एक मिलन की आस लाये हैं,

ये तुमने क्यों मौन है साधा,
बोलो क्या मन में है बाधा,

क्यूँ नहीं झट से तुम हो उठते,
क्यूँ नहीं सबसे बातें करते,

केवल तुम ही चुप लेटे हो,
क्यूँ हमको ये दुःख देते हो,

यूँ सबका अपमान करो मत,
जागो अब तो देर करो मत,

जल्दी ये शीतलता त्यागो,
उठ बैठो और दौड़ो भागो,

दूर गगन से उड़ कर आये,
साथ में लेकिन निद्रा लाये,

सबके मन में तुम ही तुम हो,
लेकिन तुम अपने में गुम हो,

अपने उर से बाहर आओ,
सबके मुख पर खुशियाँ लाओ,

तुम तो खुशियों के दाता थे,
सबके मन के प्रिय भ्राता थे,

फिर क्यों आज उलट करते हो,
सबके दिलों में दुःख भरते हो,

सुन भी लो अब निद्रा तोड़ो,
बोलो बोलो कुछ तो बोलो.

चिट्ठी न कोई सन्देश

 

Friday, July 23, 2010

अब ये जोड़ी टूट गयी

राम-लखन हमें कहते थे सब भई,
राम-लखन हमें कहते थे सब भई,
अब ये जोड़ी टूट गयी....
सबकी बानी झूठ भई....

खुशियाँ जो अब तक संग फिरती थीं,
सबकी झोलियाँ संग भरती थीं, 
सारी खुशियाँ रूठ गयीं...

घर का प्रकाश अब बना अँधियारा,
कौन करे अब इस घर उजियारा,
सारी ज्योति छूट गयी....

पीछे जो छूट गया है वैभव,
और बची ये जो सब दौलत,
विष का कड़वा घूँट भई....

बड़भागी समझ बैठे थे खुद को,
हम सिहा रहे थे इस किस्मत को,
सबकी किस्मत फूट गयी...

Monday, July 5, 2010

तड़प

ऑंखें प्यासी हैं और प्यासी ही रहेंगी सदा,
एक झलक तुमको तकने के लिए.
अब ये कैसी सी जिंदगी रह गयी है,
तेरे बिन घुटकर भुगतने के लिए.
हर आवाज अब केवल शोर सी है,
जब तेरे शब्द नहीं सुनने के लिए.
तू तेजवान था, बहुत तेजी दिखाई तूने
मैं रह गया यूँ ही तड़पने के लिए.
मन की गहराईयों में बस एक उदासी है,
चेहरे पे हंसी है दिखाने के लिए.
वही दिन वही रात वही जीवन है, लेकिन
तुम नहीं हो यहाँ दिखने के लिए.
सारा चिंतन अब कहीं खो सा गया,
कुछ न बचा अब रचने के लिए.