Saturday, November 27, 2010

राहुल राठौर: एक छोटा सा बेमिसाल जीवन

राहुल राठौर
(६.१.१९८४-३.५.२००९)
एक छोटा सा बेमिसाल जीवन


संसार में दो तरह का परोपकार होता है। एक वह जिसके पीछे नाम और पहचान की इच्छा छिपी होती और दूसरा वह जो निष्काम भाव के साथ किया जाता है। राहुल राठौर अपने छोटे से जीवन काल में दूसरे वाले परोपकार का सबसे सटीक उदाहरण बने। राहुल ने अपने जीवन में जिस तरह के परोपकार का उदाहरण प्रस्तुत किया वह उनको श्रेष्ठम पुरुषों की श्रेणी में शामिल करता है। परम भावुक, परम उदार, परमवीर और परम हितैषी राहुल के २५ वर्ष के जीवन से अगर कुछ सीखा जा सकता है तो वो ये कि अपनी इच्छाओं और परेशानियों की परवाह किए बगैर दूसरों की भरसक मदद कैसे की जाए। दूसरों के हित के लिए यदि खुद को भी खतरे में डालना पड़े तो उसमें भी कदम पीछे न रह जाएं। राहुल ने पूरी उम्र इसी बात की मिसाल पेश की।

बचपन का भोलापन बड़े हो जाने के बाद भी राहुल में जस का तस रहा। परिवार के लोग लाख समझाते कि सबकी बातों में आने की जरूरत नहीं है लेकिन राहुल ने वही किया जो दिल ने कहा। जिंदगी को पूरी तरह जीना भी राहुल को अच्छी तरह आता था। सेंट पॉल्स स्कूल में शुरुआती शिक्षा से लेकर एमआईटी से बी. टेक करने तक राहुल ने जीवन की उमंग और उत्साह को कभी नहीं मरने दिया। निराशा तो कभी पास होकर फटकी ही नहीं थी।

मुरादाबाद इंस्टीट्‌यूट ऑफ टेक्नोलॉजी (एमआईटी) में अपनी बी. टेक की पढाई के दौरान छात्रों के हितों के लिए प्लेसमेंट की आवाज उठाने का मसला रहा हो या किसी भी साथी की निजी समस्या, राहुल ने हमेशा आगे बढ कर पहल की। सही और गलत की राहुल को बहुत पहचान थी। गलत चीज कोई भी हो और कहीं भी किसी के साथ हो रही हो, वह राहुल को बर्दाद्गत नहीं थी। यही कारण था कि राहुल के चाहने वालों की फेहरिस्त बहुत लंबी थी। उन्होंने हमेशा खुद को चाहने वालों से घिरा पाया।


ऊपर से थोड़ा सख्त दिखने वाले व्यक्तित्व में एक बेहत भावुक और दयालु हृदय छिपा था। जिसने कभी अपने अंदर के भावों को उजागर नहीं किया। अपने मन की पीड़ा को सबके सामने कह देना राहुल की आदत नहीं थीं। यही कारण है कि परिवार के लोग खासतौर से राहुल के भावों को कभी समझ नहीं पाए।

बंग्लोर में यूनिसिस कंपनी में अपने डेढ साल के छोटे से कार्यकाल में ही राहुल ने वहां अपनी खास जगह बना ली थी। अपने काम और अपनी मिलनसार आदत के चलते राहुल का वहां भी सबके दिलों पर राज था। गलत बातों का विरोध जताना राहुल ने यहां भी जारी रखा।


बंग्लोर के जिस होस्टल में राहुल का निवास था वहां उनके दूसरे कुछ साथियों को सिगरेट पीने की बहुत आदत थी। राहुल को ये अच्छा नहीं लगता था। कम से कम अपने कमरे में तो सिगरेट का धुंआ कतई पसंद नहीं था। लेकिन साथियों से ज्यादा मना करते भी नहीं बनता था। सो, अपने कमरे को सिगरेट पीने वालों से छुटकारा दिलाने के लिए राहुल ने वहां एक पूजाघर स्थापित कर लिया। इससे कमरे में आने वाले राहुल के दूसरे साथी मंदिर को देखकर वहां सिगरेट नहीं पी पाते थे।

एक दिन छुट्‌टी के दिन राहुल ने होस्टल में सुंदरकांड का पाठ रखा। इसमें सबको इतना आनंद आया कि फिर वहां बार-बार सुंदरकांड किया गया। राहुल का रामायण प्रेम उन्हें परिवार से ही संस्कार में मिला था। नवंबर २००८ में जब राहुल दीवाली मनाने मुरादाबाद आए तो कुछ दिन बाद अपने मित्र विशाल के साथ कोटद्वार जाकर सिद्धबली हनुमान जी के दरबार में भंडारा किया।

खुशियाँ बांटने का कोई मौका राहुल ने कभी नहीं छोड़ा। अपने छोटे से जीवन में राहुल ने जमकर खुशियाँ लुटाईं। परिवार से भी राहुल को बेहद लगाव था। उनके आचरण से हमेशा यही झलकता कि उनको संयुक्त परिवार संस्था में अडिग विश्वास था। भले ही सॉफ्टवेयर इंजीनियर बनने के बाद राहुल को बंग्लोर में एक अच्छा प्लेसमेंट मिल गया था, लेकिन उनका अंदाज एकदम देसी था। अपने गांव नगला नीडर से राहुल को विशेष प्रेम था। जब भी छुटि्‌टयों में मुरादाबाद आना होता तो गांव जाना कभी नहीं भूलते। वहां जाकर फिर उसी देसी अंदाज में घूमना-फिरना और सबके साथ घुलमिल जाना।

लेकिन नियति को कुछ और ही मंजूर था। शायद नियति को ये पता चल गया था कि इस शक्तिवान और तेजवान व्यक्तित्व के सीने में एक बेहद कोमल हृदय बसता है। सो, नियति ने ३ मई २००९ को अचानक राहुल के हृदय पर आघात कर दिया। ऐसा आघात जो पूरे परिवार के लिए काल साबित हुआ। ईश्वर की यही इच्छा थी, ऐसा मानकर परिवार ने मन को हिम्मत बंधाने की लगातार कोशिश की, लेकिन राहुल के बाद इतना बड़ा शून्य बन गया है कि जीवनभर उसको भर पाना असंभव है।

Sunday, July 25, 2010

वो क्यूँ गया है ये भी बता कर नहीं गया...


रुख्सत हुआ तो नज़रें मिलाकर नहीं गया, वो क्यों गया है ये भी बताकर नहीं गया.

वो यूँ गया कि वाद-ए-सबा याद आ गयी, अहसास तक भी हमको दिलाकर नहीं गया.

यूँ लग रहा है जैसे अभी लौट आयेगा, जाते हुए चिराग बुझाकर नहीं गया.

बस एक लकीर खींच गया दरमियाँ में, दीवार रास्ते में लगाकर नहीं गया.

शायद वो मिल ही जाए मगर जुस्तजू है शर्त, वो अपने नक़्शे-ए-पा मिटाकर नहीं गया.

घर में है आज तक वो ही खुशबू बसी हुयी, लगता है यूँ के जैसे वो आकर कहीं गया.

तब तक तो फूल जैसी ही ताज़ा थी उसकी याद, जब तक वो पत्तियों को जुदा कर नहीं गया.

रहने दिया न उसने किसी काम का मुझे, और खाक में भी मुझको मिलाकर नहीं गया.

वैसी ही बेताब है अभी मेरी जिंदगी, वो खार-ओ-खास में आग लगा कर नहीं गया.

सबसे मिलके पूछता था उनका दर्द-ए-दिल, वो अपने दिल का दर्द जता कर नहीं गया.

'शहजाद' ये गिला ही रहा उसकी याद से, जाते हुए वो कोई गिला कर नहीं गया.

(शहजाद अहमद शहजाद)

Saturday, July 24, 2010

रूठ के हमसे...

बोलो बोलो कुछ तो बोलो

कमल पुष्प सी ऑंखें खोलो,
बोलो बोलो कुछ तो बोलो,

इस निद्रा से ऑंखें खोलो,
बोलो बोलो कुछ तो बोलो,

असमय तुमको नींद क्यूँ आई,
भोर भई अब जागो भाई,

देखो सब आये हैं मिलने,
दूर-दूर से बातें करने,

परिजन पुरजन सब आये हैं,
एक मिलन की आस लाये हैं,

ये तुमने क्यों मौन है साधा,
बोलो क्या मन में है बाधा,

क्यूँ नहीं झट से तुम हो उठते,
क्यूँ नहीं सबसे बातें करते,

केवल तुम ही चुप लेटे हो,
क्यूँ हमको ये दुःख देते हो,

यूँ सबका अपमान करो मत,
जागो अब तो देर करो मत,

जल्दी ये शीतलता त्यागो,
उठ बैठो और दौड़ो भागो,

दूर गगन से उड़ कर आये,
साथ में लेकिन निद्रा लाये,

सबके मन में तुम ही तुम हो,
लेकिन तुम अपने में गुम हो,

अपने उर से बाहर आओ,
सबके मुख पर खुशियाँ लाओ,

तुम तो खुशियों के दाता थे,
सबके मन के प्रिय भ्राता थे,

फिर क्यों आज उलट करते हो,
सबके दिलों में दुःख भरते हो,

सुन भी लो अब निद्रा तोड़ो,
बोलो बोलो कुछ तो बोलो.

चिट्ठी न कोई सन्देश

 

Friday, July 23, 2010

अब ये जोड़ी टूट गयी

राम-लखन हमें कहते थे सब भई,
राम-लखन हमें कहते थे सब भई,
अब ये जोड़ी टूट गयी....
सबकी बानी झूठ भई....

खुशियाँ जो अब तक संग फिरती थीं,
सबकी झोलियाँ संग भरती थीं, 
सारी खुशियाँ रूठ गयीं...

घर का प्रकाश अब बना अँधियारा,
कौन करे अब इस घर उजियारा,
सारी ज्योति छूट गयी....

पीछे जो छूट गया है वैभव,
और बची ये जो सब दौलत,
विष का कड़वा घूँट भई....

बड़भागी समझ बैठे थे खुद को,
हम सिहा रहे थे इस किस्मत को,
सबकी किस्मत फूट गयी...

Monday, July 5, 2010

तड़प

ऑंखें प्यासी हैं और प्यासी ही रहेंगी सदा,
एक झलक तुमको तकने के लिए.
अब ये कैसी सी जिंदगी रह गयी है,
तेरे बिन घुटकर भुगतने के लिए.
हर आवाज अब केवल शोर सी है,
जब तेरे शब्द नहीं सुनने के लिए.
तू तेजवान था, बहुत तेजी दिखाई तूने
मैं रह गया यूँ ही तड़पने के लिए.
मन की गहराईयों में बस एक उदासी है,
चेहरे पे हंसी है दिखाने के लिए.
वही दिन वही रात वही जीवन है, लेकिन
तुम नहीं हो यहाँ दिखने के लिए.
सारा चिंतन अब कहीं खो सा गया,
कुछ न बचा अब रचने के लिए.

Sunday, May 2, 2010

जो तुम आ जाओ एक बार...

जीवन के सबसे काले दिन को एक वर्ष पूरा हो गया. पिछली ३ मई को ही वो मनहूस खबर मिली कि हे रौमी तुमको काल ने हम सब को बिना कोई मौका दिए छीन लिया है. काल ने हमारे जीवन पर ये डाका इतने चुपके से डाला कि एक पल का भी मौका नहीं दिया. सब खाली हाथ मलते रह गए. पूरी दुनिया एक झटके में लुट गयी. जीवन का पहला हवाई सफ़र इतना दुखदायी होगा कभी सोचा न था. एक एक पल आज भी दिमाग में ताज़ा है. पिछले एक साल में लाख सब चीज़ों को भुलाने की कोशिश कि लेकिन दर्द है कि जाता ही नहीं. लाख कोशिश कि हालत सुधरें लेकिन न हालत सुधरे और न मानसिक स्थिति. वर्ष दर वर्ष यूँ ही समय बीतता चला जायेगा, लेकिन तुमने जो स्थान रिक्त कर दिया है वो अब कभी न भरने वाला. वह खालीपन हमेशा रहेगा, खलेगा और सताएगा. ईश्वर ने ऐसा दिन क्यूँ दिखाया ये आज तक अनसुलझी पहेली है. अब तो केवल तुम्हारी याद ही जीवन का सहारा लगता है. जीवन के सारे रंग, सारी उमंग, सारी खुशियाँ एक साथ पलायन कर गयी हैं. जीवन अब जीवन नहीं केवल अभिनय मात्र रह गया है. वैसे तो ईश्वर से अब कुछ मांगने को बचा नहीं है लेकिन अगर वह सच में करुणानिधान तो मैं उनसे केवल तुम्हारे लिए शांति चाहता हूँ. बाकी अब कुछ भी कहने को नहीं बचा है...

जो तुम आ जाओ एक बार तो फिर से सज जाये ये संसार...

ॐ शांति! शांति! शांति!

Tuesday, January 5, 2010

Happy 26th Birth Day- 6 January 2010

इस दुनिया से जाने वाले अपने साथ पीछे रह गए लोगों की ज़िन्दगी ले जाते हैं। पीछे रह गए लोगों के केवल शरीर जीवित रहते हैं, ज़िन्दगी उनके साथ नहीं होती। इस दुनिया को बीच सफ़र में अलविदा कहने वाले तो एक बार ही इस जग को अलविदा केते हैं, लेकिन पीछे रह गए लोगों को बार-बार इस दुनिया को अलविदा कहना पड़ता है। वो हँसते जरूर हैं, लेकिन उस हंसी के पीछे दर्द होता है, वो बात जरूर करते हैं लेकिन उस बातचीत के पीछे एक ख़ामोशी होती है, वो सोते जरूर हैं लेकिन उस नींद में मौत की ख्वाइश होती है, वो त्यौहार मानते जरूर हैं लेकिन वो उत्सव उदास होता है...

पीछे रह गए लोगों का जीवन क्या होता है, उसको बयां करना मुश्किल है। इस जग की यही रीत समझ से परे रही। यूँ तो मन को समझाने के लिए तमाम तर्क हैं, तमाम उदाहरण हैं, एक बार को मन समझ भी जाता है, लेकिन अगले ही पल फिर उसी दर्द में डूब जाता है। ये दुनिया बे-नूर लगने लगती है। शास्त्रों में जगत को जो मिथ्या कहकर पुकारा गया है, बस वही बात सच लगने लगती है। कुल मिलकर जिन्दगी का यही निष्कर्ष है कि इन्सान इश्वर के हाथ में एक खिलौना है। जब चाह, जिधर चाह घुमा दिया। अपनी ताकत का गुमान करने वाला इन्सान कितना कमजोर है ये वो खुद नहीं जनता। लेकिन इश्वर कहीं न कहीं, किसी न किसी मोड़ पर उसको उसकी असल पहचान जरुर कराता है। अपना तो अब यही मानना है कि ये दुनिया दिल लगाने लायक नहीं। इस मंच पर अपना किरदार अदा करो और इसे नमस्ते करो। ज्यादा दिल लगाओगे तो पछताना पड़ सकता है।

प्रिय रौमी, तुमको जन्मदिन की बधाई। न जाने तुम कहाँ हो कैसे हो, लेकिन एक दर्द के साथ तुम हमारे दिलों में तो सदा ही जीवित हो। अब ये तो मुमकिन नहीं कि तुमको जन्मदिन का कोई उपहार दिया जाये, लेकिन हम तुम्हारे लिए मंगल कामना करते हैं और ये उम्मीद भी करते हैं कि तुम अपने उसी अंदाज में इस जग को फिर से रोशन करोगे। जिन्दगी की एक नयी शुरुआत करना, तुमको ऐसा सुन्दर संसार मिले जहाँ तुम अपनी ख्वाहिशों के साथ उड़ान भर सको, जहाँ तुम अपनी जिन्दगी को भरपूर जी सको....