Tuesday, May 3, 2011

बीत गए दो साल...

लो! देखते देखते आज दो वर्ष पूरे हो गए. फिर से ३ मई आ गयी. आज ही के दिन तुम हमें इस संसार में अकेला छोड़ कर न जाने किस लोक की यात्रा पर निकल गए. आज तक तुम्हारी मृत्यु मेरे लिए रहस्य बनी हुई है. आखिर तुम्हारे जैसे व्यक्तित्व को काल इस तरह कैसे शिकार बना सकता है. तुम कोमल ह्रदय थे ये मुझे मालूम है, लेकिन कमजोर दिल नहीं थे. उस हार्ट अटैक का यूँ अचानक आना और तुमको अपने साथ ले जाना आज तक गले नहीं उतरा. लगातार यही खोज रहा हूँ की आखिर ऐसा क्यूँ हुआ और कैसा हुआ. मुझे पूरी उम्मीद है की मुझे एक दिन अपने सवालों का जवाब जरूर मिल जायेगा. हालाँकि जवाब मिलने पर कोई खास फर्क तो नहीं पड़ेगा लेकिन मन को शांति जरूर मिल जाएगी. वैसे अब तुम्हारे बिना जीने की आदत पड़ती जा रही है, लेकिन सच कह रहा हूँ तुम्हारे बिना जिंदगी अब जिंदगी नहीं बची है. बस समय काटा जा रहा है. लेकिन समय कितनी जल्दी बीतता चला जाता है पता ही नहीं चलता. समय सबसे बड़ा हीलर होता है ये तो सब कहते थे. लेकिन कैसे होता है ये अब पता चला.



पिछले दिनों परिवार में एक ख़ुशी का भी मौका आया. लेकिन कोई दिल से खुश नहीं था, सब खुश होने का अभिनय कर रहे थे. मैंने तो न जाने कितनी बार कितने लोगों पर अपनी झुंझलाहट निकाली. मैं तुम्हारे बिना उस अवसर कतई एन्जॉय नहीं करना चाहता था. मैंने कोशिश भी यही की कि सब कुछ शालीन रहे. सच पूछो तो अब मुझे खुशियों से डर लगने लगा है. तुम होते तो सबसे ज्यादा खुश तुम ही होते. सारा घर आसमान पर उठा लेते. हालाँकि विशाल ने इस मौके पर अपना पूरा दायित्व निभाया. लेकिन तुम्हारी कमी उसको भी खल रही थी. अब वो अकेला ही घर आता है. पहले हमेशा तुमको साथ लेकर आता था.



हाँ एक सुखद घटना ये जरूर घटी है कि परिवार में ही तुम्हारा जन्म हुआ बताया जा रहा है. अगर ये सही है तो मुझे तुम्हारे इस नए रूप के बोलने का इंतज़ार है. शायद तुम्हारे अन्दर से कुछ बात निकले और मेरे सवालों का जवाब मिले. मेरा मन ज्यादा तार्किक है यूँ ही विश्वास नहीं करता है. लेकिन घर के सब लोगों को इस नए रूप में तुम ही नज़र आते हो. आना तो तुमको था ही, क्योंकि तुम्हारे कई सपने अधूरे रह गए थे, उनको पूरा तो करना ही होगा और फिर तुमको घर से बेहद लगाव भी था. तुम्हारा ये नया रूप मुझे भी बहुत आकर्षित करता है. अच्छी बात है! लेकिन अभी मुझे अपने सवालों का जवाब नहीं मिला है. तुम्हारे जाने बाद मैंने कवितायेँ लिखनी तो छोड़ दी हैं लेकिन कुछ दिन पहले जब तुम्हारी याद आ रही थी तो अपने आप ही अन्दर से कुछ पंक्तियाँ निकल पड़ी. हालाँकि तुम इनको पढ़ तो नहीं सकते फिर भी अपनी संतुष्टि के लिए लिख रहा हूँ....



सभी हैं खास-खास आज आसपास मेरे,

एक बस तुम ही नहीं दिख रहे हो साथ मेरे,

चली है जिंदगी बनाके अपना मोहरा हमें,

बची नहीं है चाल आज कोई पास मेरे...


आ रहे बार बार होठों पे जज्बात मेरे,

नमी भरी है चहुँ ओर आसपास मेरे,

क्या कहूँ किससे कहूँ सोच रहा हूँ बैठा,

कोई हमदर्द नहीं दिख रहा है पास मेरे.


सफ़र के बीच तू अकेला हमें छोड़ गया,

राह में बिछ गए हैं आज बहुत खार मेरे,

रह रह के आ रहा है मन में ख्याल यही,

क्यों तू दिख नहीं रहा है आज पास मेरे.



तेरी याद बन गयी है जिंदगी का सबब,

तेरे ख्वाब बन गए हैं इंतज़ार मेरे,

कहूँ मैं कैसे तुमको अपने दिल की चुभन

जुबां पर आ नहीं रहे हैं अब भाव मेरे.

Saturday, March 26, 2011

तुम ही नहीं दिख रहे हो साथ मेरे!


सभी हैं खास-खास आज आसपास मेरे,
एक बस तुम ही नहीं दिख रहे हो साथ मेरे,
चली है जिंदगी बनाके अपना मोहरा हमें,
बची नहीं है चाल आज कोई पास मेरे...

आ रहे बार बार होठों पे जज्बात मेरे,
नमी भरी है चहुँ ओर आसपास मेरे,
क्या कहूँ किससे कहूँ सोच रहा हूँ बैठा,
कोई हमदर्द नहीं दिख रहा है पास मेरे.

सफ़र के बीच तू अकेला हमें छोड़ गया,
राह में बिछ गए हैं आज बहुत खार मेरे,
रह रह के आ रहा है मन में ख्याल यही,
क्यों तू दिख नहीं रहा है आज पास मेरे.


तेरी याद बन गयी है जिंदगी का सबब,
तेरे ख्वाब बन गए हैं इंतज़ार मेरे,
कहूँ मैं कैसे तुमको अपने दिल की चुभन
जुबां पर आ नहीं रहे हैं अब भाव मेरे.

Saturday, November 27, 2010

राहुल राठौर: एक छोटा सा बेमिसाल जीवन

राहुल राठौर
(६.१.१९८४-३.५.२००९)
एक छोटा सा बेमिसाल जीवन


संसार में दो तरह का परोपकार होता है। एक वह जिसके पीछे नाम और पहचान की इच्छा छिपी होती और दूसरा वह जो निष्काम भाव के साथ किया जाता है। राहुल राठौर अपने छोटे से जीवन काल में दूसरे वाले परोपकार का सबसे सटीक उदाहरण बने। राहुल ने अपने जीवन में जिस तरह के परोपकार का उदाहरण प्रस्तुत किया वह उनको श्रेष्ठम पुरुषों की श्रेणी में शामिल करता है। परम भावुक, परम उदार, परमवीर और परम हितैषी राहुल के २५ वर्ष के जीवन से अगर कुछ सीखा जा सकता है तो वो ये कि अपनी इच्छाओं और परेशानियों की परवाह किए बगैर दूसरों की भरसक मदद कैसे की जाए। दूसरों के हित के लिए यदि खुद को भी खतरे में डालना पड़े तो उसमें भी कदम पीछे न रह जाएं। राहुल ने पूरी उम्र इसी बात की मिसाल पेश की।

बचपन का भोलापन बड़े हो जाने के बाद भी राहुल में जस का तस रहा। परिवार के लोग लाख समझाते कि सबकी बातों में आने की जरूरत नहीं है लेकिन राहुल ने वही किया जो दिल ने कहा। जिंदगी को पूरी तरह जीना भी राहुल को अच्छी तरह आता था। सेंट पॉल्स स्कूल में शुरुआती शिक्षा से लेकर एमआईटी से बी. टेक करने तक राहुल ने जीवन की उमंग और उत्साह को कभी नहीं मरने दिया। निराशा तो कभी पास होकर फटकी ही नहीं थी।

मुरादाबाद इंस्टीट्‌यूट ऑफ टेक्नोलॉजी (एमआईटी) में अपनी बी. टेक की पढाई के दौरान छात्रों के हितों के लिए प्लेसमेंट की आवाज उठाने का मसला रहा हो या किसी भी साथी की निजी समस्या, राहुल ने हमेशा आगे बढ कर पहल की। सही और गलत की राहुल को बहुत पहचान थी। गलत चीज कोई भी हो और कहीं भी किसी के साथ हो रही हो, वह राहुल को बर्दाद्गत नहीं थी। यही कारण था कि राहुल के चाहने वालों की फेहरिस्त बहुत लंबी थी। उन्होंने हमेशा खुद को चाहने वालों से घिरा पाया।


ऊपर से थोड़ा सख्त दिखने वाले व्यक्तित्व में एक बेहत भावुक और दयालु हृदय छिपा था। जिसने कभी अपने अंदर के भावों को उजागर नहीं किया। अपने मन की पीड़ा को सबके सामने कह देना राहुल की आदत नहीं थीं। यही कारण है कि परिवार के लोग खासतौर से राहुल के भावों को कभी समझ नहीं पाए।

बंग्लोर में यूनिसिस कंपनी में अपने डेढ साल के छोटे से कार्यकाल में ही राहुल ने वहां अपनी खास जगह बना ली थी। अपने काम और अपनी मिलनसार आदत के चलते राहुल का वहां भी सबके दिलों पर राज था। गलत बातों का विरोध जताना राहुल ने यहां भी जारी रखा।


बंग्लोर के जिस होस्टल में राहुल का निवास था वहां उनके दूसरे कुछ साथियों को सिगरेट पीने की बहुत आदत थी। राहुल को ये अच्छा नहीं लगता था। कम से कम अपने कमरे में तो सिगरेट का धुंआ कतई पसंद नहीं था। लेकिन साथियों से ज्यादा मना करते भी नहीं बनता था। सो, अपने कमरे को सिगरेट पीने वालों से छुटकारा दिलाने के लिए राहुल ने वहां एक पूजाघर स्थापित कर लिया। इससे कमरे में आने वाले राहुल के दूसरे साथी मंदिर को देखकर वहां सिगरेट नहीं पी पाते थे।

एक दिन छुट्‌टी के दिन राहुल ने होस्टल में सुंदरकांड का पाठ रखा। इसमें सबको इतना आनंद आया कि फिर वहां बार-बार सुंदरकांड किया गया। राहुल का रामायण प्रेम उन्हें परिवार से ही संस्कार में मिला था। नवंबर २००८ में जब राहुल दीवाली मनाने मुरादाबाद आए तो कुछ दिन बाद अपने मित्र विशाल के साथ कोटद्वार जाकर सिद्धबली हनुमान जी के दरबार में भंडारा किया।

खुशियाँ बांटने का कोई मौका राहुल ने कभी नहीं छोड़ा। अपने छोटे से जीवन में राहुल ने जमकर खुशियाँ लुटाईं। परिवार से भी राहुल को बेहद लगाव था। उनके आचरण से हमेशा यही झलकता कि उनको संयुक्त परिवार संस्था में अडिग विश्वास था। भले ही सॉफ्टवेयर इंजीनियर बनने के बाद राहुल को बंग्लोर में एक अच्छा प्लेसमेंट मिल गया था, लेकिन उनका अंदाज एकदम देसी था। अपने गांव नगला नीडर से राहुल को विशेष प्रेम था। जब भी छुटि्‌टयों में मुरादाबाद आना होता तो गांव जाना कभी नहीं भूलते। वहां जाकर फिर उसी देसी अंदाज में घूमना-फिरना और सबके साथ घुलमिल जाना।

लेकिन नियति को कुछ और ही मंजूर था। शायद नियति को ये पता चल गया था कि इस शक्तिवान और तेजवान व्यक्तित्व के सीने में एक बेहद कोमल हृदय बसता है। सो, नियति ने ३ मई २००९ को अचानक राहुल के हृदय पर आघात कर दिया। ऐसा आघात जो पूरे परिवार के लिए काल साबित हुआ। ईश्वर की यही इच्छा थी, ऐसा मानकर परिवार ने मन को हिम्मत बंधाने की लगातार कोशिश की, लेकिन राहुल के बाद इतना बड़ा शून्य बन गया है कि जीवनभर उसको भर पाना असंभव है।

Sunday, July 25, 2010

वो क्यूँ गया है ये भी बता कर नहीं गया...


रुख्सत हुआ तो नज़रें मिलाकर नहीं गया, वो क्यों गया है ये भी बताकर नहीं गया.

वो यूँ गया कि वाद-ए-सबा याद आ गयी, अहसास तक भी हमको दिलाकर नहीं गया.

यूँ लग रहा है जैसे अभी लौट आयेगा, जाते हुए चिराग बुझाकर नहीं गया.

बस एक लकीर खींच गया दरमियाँ में, दीवार रास्ते में लगाकर नहीं गया.

शायद वो मिल ही जाए मगर जुस्तजू है शर्त, वो अपने नक़्शे-ए-पा मिटाकर नहीं गया.

घर में है आज तक वो ही खुशबू बसी हुयी, लगता है यूँ के जैसे वो आकर कहीं गया.

तब तक तो फूल जैसी ही ताज़ा थी उसकी याद, जब तक वो पत्तियों को जुदा कर नहीं गया.

रहने दिया न उसने किसी काम का मुझे, और खाक में भी मुझको मिलाकर नहीं गया.

वैसी ही बेताब है अभी मेरी जिंदगी, वो खार-ओ-खास में आग लगा कर नहीं गया.

सबसे मिलके पूछता था उनका दर्द-ए-दिल, वो अपने दिल का दर्द जता कर नहीं गया.

'शहजाद' ये गिला ही रहा उसकी याद से, जाते हुए वो कोई गिला कर नहीं गया.

(शहजाद अहमद शहजाद)

Saturday, July 24, 2010

रूठ के हमसे...

बोलो बोलो कुछ तो बोलो

कमल पुष्प सी ऑंखें खोलो,
बोलो बोलो कुछ तो बोलो,

इस निद्रा से ऑंखें खोलो,
बोलो बोलो कुछ तो बोलो,

असमय तुमको नींद क्यूँ आई,
भोर भई अब जागो भाई,

देखो सब आये हैं मिलने,
दूर-दूर से बातें करने,

परिजन पुरजन सब आये हैं,
एक मिलन की आस लाये हैं,

ये तुमने क्यों मौन है साधा,
बोलो क्या मन में है बाधा,

क्यूँ नहीं झट से तुम हो उठते,
क्यूँ नहीं सबसे बातें करते,

केवल तुम ही चुप लेटे हो,
क्यूँ हमको ये दुःख देते हो,

यूँ सबका अपमान करो मत,
जागो अब तो देर करो मत,

जल्दी ये शीतलता त्यागो,
उठ बैठो और दौड़ो भागो,

दूर गगन से उड़ कर आये,
साथ में लेकिन निद्रा लाये,

सबके मन में तुम ही तुम हो,
लेकिन तुम अपने में गुम हो,

अपने उर से बाहर आओ,
सबके मुख पर खुशियाँ लाओ,

तुम तो खुशियों के दाता थे,
सबके मन के प्रिय भ्राता थे,

फिर क्यों आज उलट करते हो,
सबके दिलों में दुःख भरते हो,

सुन भी लो अब निद्रा तोड़ो,
बोलो बोलो कुछ तो बोलो.

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