Saturday, June 20, 2009

कैसे भूलें



हा राहुल मम प्रियतम भ्राता, ऐसे भी कोई छोड़ के जाता।

ऐसे क्यों तू हमसे रूठा, तेरे बिन हर सपना टूटा।

सिंह पुरूष था तू तो भइया, कवन कालवश डूबी नैया।

ऑंखें गीली आए न चैना, तेरा ख्याल रहे दिन रैना।

यादों में हैं खेल खिलौने, लुक-छुप छिपना झूल झुलौने।

हाथ-पाई लड़ना झगड़ना, एक कमरे में संग-संग पढ़ना।

आजा भइया और झगड़ ले, मैं दौडूँ तू मुझको पकड़ ले।

मम्मी-पापा दादा-दादी, सह न सकेंगे ये बर्बादी।

रोमी अब तो आए न धीरज, आँखों में है नीरज-नीरज।

तेरे लिए कुछ कर न सके हम, पुरी उमर अब रहेगा ये

पल में उजड़ गई ये फुलवारी, मन की उम्मीदें मर गयीं सारी।

रोमी-रोमी ये मन रटता, चैन न पड़ता दर्द न बंटता।

कौन करे अब भोली बातें, कौन उठाये सिर पर रातें।

कुल की चिंता कौन करेगा, सुख से दामन कौन भरेगा।

होली के रंग कौन लगाये, कौन दिवाली दीप जलाये।

हे कुलदीपक तू तो छूटा, इस घर अब कर्म है फूटा।

ऐसे क्यों सब छोड़ गया तू, हमको जिन्दा तोड़ गया तू।

3 comments:

  1. वाकई-दुखदाई
    होती है अपनो की जुदाई


    ‘.जानेमन इतनी तुम्हारी याद आती है कि बस......’
    इस गज़ल को पूरा पढें यहां
    श्याम सखा ‘श्याम’

    http//:gazalkbahane.blogspot.com/ पर एक-दो गज़ल वज्न सहित हर सप्ताह या
    http//:katha-kavita.blogspot.com/ पर कविता ,कथा, लघु-कथा,वैचारिक लेख पढें

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  2. बहुत दुखदाई ….. आपके इस सुंदर से चिटठे के साथ आपका ब्‍लाग जगत में स्‍वागत है…..आशा है , आप अपनी प्रतिभा से हिन्‍दी चिटठा जगत को समृद्ध करने और हिन्‍दी पाठको को ज्ञान बांटने के साथ साथ खुद भी सफलता प्राप्‍त करेंगे …..हमारी शुभकामनाएं आपके साथ हैं।

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  3. हिंदी भाषा को इन्टरनेट जगत मे लोकप्रिय करने के लिए आपका साधुवाद |

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