Saturday, June 20, 2009

कैसे भूलें



हा राहुल मम प्रियतम भ्राता, ऐसे भी कोई छोड़ के जाता।

ऐसे क्यों तू हमसे रूठा, तेरे बिन हर सपना टूटा।

सिंह पुरूष था तू तो भइया, कवन कालवश डूबी नैया।

ऑंखें गीली आए न चैना, तेरा ख्याल रहे दिन रैना।

यादों में हैं खेल खिलौने, लुक-छुप छिपना झूल झुलौने।

हाथ-पाई लड़ना झगड़ना, एक कमरे में संग-संग पढ़ना।

आजा भइया और झगड़ ले, मैं दौडूँ तू मुझको पकड़ ले।

मम्मी-पापा दादा-दादी, सह न सकेंगे ये बर्बादी।

रोमी अब तो आए न धीरज, आँखों में है नीरज-नीरज।

तेरे लिए कुछ कर न सके हम, पुरी उमर अब रहेगा ये

पल में उजड़ गई ये फुलवारी, मन की उम्मीदें मर गयीं सारी।

रोमी-रोमी ये मन रटता, चैन न पड़ता दर्द न बंटता।

कौन करे अब भोली बातें, कौन उठाये सिर पर रातें।

कुल की चिंता कौन करेगा, सुख से दामन कौन भरेगा।

होली के रंग कौन लगाये, कौन दिवाली दीप जलाये।

हे कुलदीपक तू तो छूटा, इस घर अब कर्म है फूटा।

ऐसे क्यों सब छोड़ गया तू, हमको जिन्दा तोड़ गया तू।

Saturday, May 23, 2009

Love you Rommy

एक आह भरी होगी, हमने न सुनी होगी, जाते-जाते तुमने आवाज़ तो दी होगी,

हर वक्त यही है गम, उस वक्त कहाँ थे हम, कहाँ तुम चले गए...

सोचा न था...


तुम ऐसा दिन दिखाओगे, ये कभी सोचा न था,
बीच सफर में हमको छोड़ जाओगे, सोचा था,
इतनी सारी खुशियाँ देकर, आँखों को नए सपने देकर,
तुम ख़ुद मुरझा जाओगे, सोचा न था,
नन्हीं नन्हीं खुशियों ने अभी घर में कदम रखे ही थे,
इन खुशियों के बीच तुम ऐसा पहाड़ तोड़ जाओगे, सोचा न था,
तुम्हारे बिना खुशियों की कल्पना ही व्यर्थ है,
तुम ऐसे सबको तडपाओगे सोचा न था,
दिन तुम्हारी याद में और रात रोते कटती है,
तुम इतना हमें रुलाओगे, सोचा न था...

Wednesday, May 20, 2009

कहाँ तुम चले गए...


जीवन में कुछ कलियाँ खिली ही थीं, लंबे अन्तराल के बाद होठों पर मुस्कराहट ने दस्तक दी थी, परिवार में थोड़ा सा संतोष का भाव आया था, इस बात की सूचना किसी ने ईश्वर को दे दी और उसने काल को भेजकर राहुल तुमको हमसे छीन लिया। परिवार का सबसे होनहार हीरा भगवान को पसंद आया। कोई कारण भी न था। आधा घंटे के अन्दर सब खत्म हो गया, बिना हमे ये मौका दिए की हम तुम्हारे लिए कुछ कर सकें। किसी ने सोचा भी न था की इतनी छोटी सी उम्र में तुम्हारा शक्तिशाली शरीर हार्ट अटैक का शिकार हो जाएगा। हम तड़पते रहे तुमसे मिलने के लिए, पर भगवान ने इतना भी मौका न दिया की हम तुमसे बात भी कर पाते। तुम्हें बंगलोर से मुरादाबाद तक लाने में ही पापा बूढे हो गए। तुमने अपने छोटे से जीवन में केवल परोपकार किया। अपने बारे में कभी सोचा ही नहीं। अगर सोचते तो शायद ऐसा नहीं होता। खैर अब तो हम सबकी आँखों में बस आंसू हैं और तुम्हारी यादें हैं। मम्मी-पापा अब सचमुच बूढे हो गए हैं, परिवार का एक-एक सदस्य टूट चुका है। सब यही जानना चाहते हैं कि क्या भलाई का यही नतीजा होता है।