राहुल राठौर
(६.१.१९८४-३.५.२००९)
एक छोटा सा बेमिसाल जीवन
संसार में दो तरह का परोपकार होता है। एक वह जिसके पीछे नाम और पहचान की इच्छा छिपी होती और दूसरा वह जो निष्काम भाव के साथ किया जाता है। राहुल राठौर अपने छोटे से जीवन काल में दूसरे वाले परोपकार का सबसे सटीक उदाहरण बने। राहुल ने अपने जीवन में जिस तरह के परोपकार का उदाहरण प्रस्तुत किया वह उनको श्रेष्ठम पुरुषों की श्रेणी में शामिल करता है। परम भावुक, परम उदार, परमवीर और परम हितैषी राहुल के २५ वर्ष के जीवन से अगर कुछ सीखा जा सकता है तो वो ये कि अपनी इच्छाओं और परेशानियों की परवाह किए बगैर दूसरों की भरसक मदद कैसे की जाए। दूसरों के हित के लिए यदि खुद को भी खतरे में डालना पड़े तो उसमें भी कदम पीछे न रह जाएं। राहुल ने पूरी उम्र इसी बात की मिसाल पेश की।
बचपन का भोलापन बड़े हो जाने के बाद भी राहुल में जस का तस रहा। परिवार के लोग लाख समझाते कि सबकी बातों में आने की जरूरत नहीं है लेकिन राहुल ने वही किया जो दिल ने कहा। जिंदगी को पूरी तरह जीना भी राहुल को अच्छी तरह आता था। सेंट पॉल्स स्कूल में शुरुआती शिक्षा से लेकर एमआईटी से बी. टेक करने तक राहुल ने जीवन की उमंग और उत्साह को कभी नहीं मरने दिया। निराशा तो कभी पास होकर फटकी ही नहीं थी।
मुरादाबाद इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी (एमआईटी) में अपनी बी. टेक की पढाई के दौरान छात्रों के हितों के लिए प्लेसमेंट की आवाज उठाने का मसला रहा हो या किसी भी साथी की निजी समस्या, राहुल ने हमेशा आगे बढ कर पहल की। सही और गलत की राहुल को बहुत पहचान थी। गलत चीज कोई भी हो और कहीं भी किसी के साथ हो रही हो, वह राहुल को बर्दाद्गत नहीं थी। यही कारण था कि राहुल के चाहने वालों की फेहरिस्त बहुत लंबी थी। उन्होंने हमेशा खुद को चाहने वालों से घिरा पाया।
ऊपर से थोड़ा सख्त दिखने वाले व्यक्तित्व में एक बेहत भावुक और दयालु हृदय छिपा था। जिसने कभी अपने अंदर के भावों को उजागर नहीं किया। अपने मन की पीड़ा को सबके सामने कह देना राहुल की आदत नहीं थीं। यही कारण है कि परिवार के लोग खासतौर से राहुल के भावों को कभी समझ नहीं पाए।
बंग्लोर में यूनिसिस कंपनी में अपने डेढ साल के छोटे से कार्यकाल में ही राहुल ने वहां अपनी खास जगह बना ली थी। अपने काम और अपनी मिलनसार आदत के चलते राहुल का वहां भी सबके दिलों पर राज था। गलत बातों का विरोध जताना राहुल ने यहां भी जारी रखा।
बंग्लोर के जिस होस्टल में राहुल का निवास था वहां उनके दूसरे कुछ साथियों को सिगरेट पीने की बहुत आदत थी। राहुल को ये अच्छा नहीं लगता था। कम से कम अपने कमरे में तो सिगरेट का धुंआ कतई पसंद नहीं था। लेकिन साथियों से ज्यादा मना करते भी नहीं बनता था। सो, अपने कमरे को सिगरेट पीने वालों से छुटकारा दिलाने के लिए राहुल ने वहां एक पूजाघर स्थापित कर लिया। इससे कमरे में आने वाले राहुल के दूसरे साथी मंदिर को देखकर वहां सिगरेट नहीं पी पाते थे।
एक दिन छुट्टी के दिन राहुल ने होस्टल में सुंदरकांड का पाठ रखा। इसमें सबको इतना आनंद आया कि फिर वहां बार-बार सुंदरकांड किया गया। राहुल का रामायण प्रेम उन्हें परिवार से ही संस्कार में मिला था। नवंबर २००८ में जब राहुल दीवाली मनाने मुरादाबाद आए तो कुछ दिन बाद अपने मित्र विशाल के साथ कोटद्वार जाकर सिद्धबली हनुमान जी के दरबार में भंडारा किया।
खुशियाँ बांटने का कोई मौका राहुल ने कभी नहीं छोड़ा। अपने छोटे से जीवन में राहुल ने जमकर खुशियाँ लुटाईं। परिवार से भी राहुल को बेहद लगाव था। उनके आचरण से हमेशा यही झलकता कि उनको संयुक्त परिवार संस्था में अडिग विश्वास था। भले ही सॉफ्टवेयर इंजीनियर बनने के बाद राहुल को बंग्लोर में एक अच्छा प्लेसमेंट मिल गया था, लेकिन उनका अंदाज एकदम देसी था। अपने गांव नगला नीडर से राहुल को विशेष प्रेम था। जब भी छुटि्टयों में मुरादाबाद आना होता तो गांव जाना कभी नहीं भूलते। वहां जाकर फिर उसी देसी अंदाज में घूमना-फिरना और सबके साथ घुलमिल जाना।
लेकिन नियति को कुछ और ही मंजूर था। शायद नियति को ये पता चल गया था कि इस शक्तिवान और तेजवान व्यक्तित्व के सीने में एक बेहद कोमल हृदय बसता है। सो, नियति ने ३ मई २००९ को अचानक राहुल के हृदय पर आघात कर दिया। ऐसा आघात जो पूरे परिवार के लिए काल साबित हुआ। ईश्वर की यही इच्छा थी, ऐसा मानकर परिवार ने मन को हिम्मत बंधाने की लगातार कोशिश की, लेकिन राहुल के बाद इतना बड़ा शून्य बन गया है कि जीवनभर उसको भर पाना असंभव है।