जीवन के सबसे काले दिन को एक वर्ष पूरा हो गया. पिछली ३ मई को ही वो मनहूस खबर मिली कि हे रौमी तुमको काल ने हम सब को बिना कोई मौका दिए छीन लिया है. काल ने हमारे जीवन पर ये डाका इतने चुपके से डाला कि एक पल का भी मौका नहीं दिया. सब खाली हाथ मलते रह गए. पूरी दुनिया एक झटके में लुट गयी. जीवन का पहला हवाई सफ़र इतना दुखदायी होगा कभी सोचा न था. एक एक पल आज भी दिमाग में ताज़ा है. पिछले एक साल में लाख सब चीज़ों को भुलाने की कोशिश कि लेकिन दर्द है कि जाता ही नहीं. लाख कोशिश कि हालत सुधरें लेकिन न हालत सुधरे और न मानसिक स्थिति. वर्ष दर वर्ष यूँ ही समय बीतता चला जायेगा, लेकिन तुमने जो स्थान रिक्त कर दिया है वो अब कभी न भरने वाला. वह खालीपन हमेशा रहेगा, खलेगा और सताएगा. ईश्वर ने ऐसा दिन क्यूँ दिखाया ये आज तक अनसुलझी पहेली है. अब तो केवल तुम्हारी याद ही जीवन का सहारा लगता है. जीवन के सारे रंग, सारी उमंग, सारी खुशियाँ एक साथ पलायन कर गयी हैं. जीवन अब जीवन नहीं केवल अभिनय मात्र रह गया है. वैसे तो ईश्वर से अब कुछ मांगने को बचा नहीं है लेकिन अगर वह सच में करुणानिधान तो मैं उनसे केवल तुम्हारे लिए शांति चाहता हूँ. बाकी अब कुछ भी कहने को नहीं बचा है...जो तुम आ जाओ एक बार तो फिर से सज जाये ये संसार...
ॐ शांति! शांति! शांति!